संदेश

अपनी-अपनी ख़ुशी

     घर जाने के लिए बस स्टॉप पर बस का इंतज़ार कर रहा था कि तभी चार-पांच छोटे-छोटे बच्चे उछलते-कूदते स्टॉप पर पहुंचे. ये बच्चे शायद पास की किसी बस्ती के रहने वाले थे और उचक-उचक कर देखने लगे कि बस आ रही है नहीं. इतने में डी. टी. सी. लाल ऐ-सी बस आती दिखी. जैसे ही वो बस रुकी, झट से सभी बच्चे उसमे चढ़ने लगे. ठीक उसी समय बस कंडक्टर की नज़र उन बच्चों पर पड़ी. 'नीचे उतरो' - ज़ोरदार आवाज़ में वो इन बच्चों पर चिल्लाया. लेकिन सभी बच्चे हंसते-हंसते 'ले-ली, ले-ली' कह कर भागते हुए बस से नीचे उतरने लगे. इसके बाद बच्चे फिर से दूसरी बस का इंतज़ार करने लगे जैसे ही कोई लाल ऐ-सी बस रुकती और ये सभी बच्चे उसमे चढ़ते और फिर ले-ली, ले-ली कह कर भागते हुए नीचे उतरने लगते. दरसअल इन बच्चों को जाना कहीं नहीं था सिर्फ इंतज़ार होता था कि लाल ऐ-सी बस आये और ये बच्चे ऐ-सी की ठंडी हवा खाएं. शायद इन बच्चों के लिए इसी में ख़ुशी छिपी थी. अगर कंडक्टर की नज़र न पड़ती तो शायद थोड़ी दूर तक घूम भी आते. बच्चों की इस मासूम सी शरारत ने मुझे बस का इंतज़ार ही भुला दिया. अब मैं अपनी बस का नहीं लाल ऐ-सी बस का इंतज़ार करने लगा...

भारत-चीन युद्ध: फ़िलहाल कोई आसार नहीं

      भारत और चीन के बीच पिछले महीने से सिक्किम के निकट जारी गतिरोध के बीच दोनों देशों के संबंधो में विश्वास की कमी को महसूस किया जा रहा है. विश्वास और भरोसा कायम करने की कोशिशें, भारत और चीन दोनों की ओर से ज़रूर हुई लेकिन संबंध उस दिशा आगे नहीं बढ़ सके, जहां उन्हें पहुंचना चाहिए था. दशकों पुराने सीमा विवाद और हाल के घटनाक्रम ने दोनो देशों के संबंधो को 1962 के बाद एक फिर संशय में डाल दिया है. अगर मीडिया में आ  रही ख़बरों को माने तो निकट भविष्य में  दोनों देशों के बीच  युद्ध होने जा रहा है दोनों देश इसकी तैयारी भी कर रहे हैं. मौजूदा समय युद्ध की नहीं बल्कि संयम और एक-दूसरे पर भरोसा रखने की मांग करता है. दोनों देशों का परिपक्व नेतृत्व इस गतिरोध को दूर कर ही लेगा .  मगर इस दौरान दोनों देशों के बीच जो कटुता बढ़ रही है उसे दूर करने में लम्बा समय लग सकता है.               इस गतिरोध के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग जर्मनी के हैम्बर्ग शहर में 7 और 8 जुलाई को हुए जी-20 सम्मेल...

छपरा का रेडियो मयूर 90.8 और मेरी यादें...

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        यहां ब्लॉग पर लिखना तो पिछले साल फ़रवरी में था. यानी फ़रवरी 2016 में, लेकिन मैं लिखने बैठा हूं अब फ़रवरी 2017 में, यानी पूरे एक साल बाद. कुछ आलस और कुछ फालतू के काम और ज़िन्दगी की तमाम उलझनों में फंस कर रह गया और लिखना टलता गया. अभी कुछ दिन पहले ही सलमान और प्रिंस ने फेसबुक पर फोटो पोस्ट की कि हमारी दोस्ती को एक साल हो गया है. तभी याद आया कि छपरा पहली बार गए हुए भी तो मुझे एक साल हो गया है और फिर छपरा तो दोबारा भी होकर आ गया हूं. सोचा, अब तो लिखना ही है चाहे कुछ भी हो. सलमान, प्रिंस और बहुत से दोस्तों और चाहने वालों से मुझे मिलवाया मेरे पुराने ऑफिस लोक सभा टेलीविज़न के साथी और अब दोस्त आकाश अरुण ने. छपरा से लौट कर मैंने आकाश से कहा था कि छपरा और छपरा के पहले कम्युनिटी रेडियो के बारे में ज़रूर कुछ लिखूंगा.         सपना क्या होता है? सपने को साकार करने के लिए कैसे कड़ी मेहनत की जाती है? कैसे किसी सपने के साथ जिया जाता है और जब सपना साकार हो जाता है तब कैसा महसूस होता है? उस सपने को मैंने छपरा में साकार हो...

हमारे आशियाने

          पिछले दिनों मेट्रो स्टेशन की सीढियां चढ़ते समय देखा कि कुछ मज़दूर प्लाई बोर्ड से कबूतरों और दूसरे पक्षियों  के बैठने जगह बंद कर रहे थे। इन स्थानों को बंद करने का सीधा-सा मतलब था कि कबूतरों को बैठने से रोका जाए और शायद मेट्रो के अधिकारियों को सबसे आसान तरीका भी यही लगा। यह पंक्तियां शायद उन्ही बेज़ुबां पक्षियों की आवाज़ हम तक पहुंचा रही हैं - आख़िर एक बार फिर पड़ ही गयी तुम्हारी नज़र हम पर आख़िर कहां अपना आशियाना बनाए हम सोचो और बताओ कि अब भला कहां जाएं हम कभी पहले हुआ करते थे कुछ पेड़ यहां बसेरा हुआ करता था उन पर अपना यहां सुख-दुःख हमने अपनो संग मिल कर बांटें यहां मिलना होता था अपनों से कुछ देर के लिए यहां बस दो पल रुकते थे हम यहां अपनों से अपनी बातें होती थी रूठना और मनाना होता था यहां और फिर एक ऊंची उड़ान का दौर होता था लौट कर फिर यहां आते और कुछ लम्हे बिताते थे थोड़ी देर सुसताते थे और फिर एक बार उड़ जाते थे लेकिन काट दिए तुमने हमारे वो सारे आशियाने काटी तुमने उन पेड़ों की एक-एक टहनी उसकी बात तुमसे अब क्या कहनी आंखों के सामन...

अदम गोंडवी की कुछ रचनाएं

वो जिसके हाथ में छाले हैं पैरों में बिवाई है वो जिसके हाथ में छाले हैं पैरों में बिवाई है उसी के दम से रौनक आपके बँगले में आई है इधर एक दिन की आमदनी का औसत है चवन्‍नी का उधर लाखों में गांधी जी के चेलों की कमाई है कोई भी सिरफिरा धमका के जब चाहे जिना कर ले हमारा मुल्‍क इस माने में बुधुआ की लुगाई है रोटी कितनी महँगी है ये वो औरत बताएगी जिसने जिस्म गिरवी रख के ये क़ीमत चुकाई है तुम्‍हारी फाइलों में गाँव का मौसम गुलाबी है तुम्‍हारी फाइलों में गाँव का मौसम गुलाबी है मगर ये आँकड़े झूठे हैं ये दावा किताबी है उधर जमहूरियत का ढोल पीटे जा रहे हैं वो इधर परदे के पीछे बर्बरीयत है, नवाबी है लगी है होड़-सी देखो अमीरी औ' गरीबी में ये गांधीवाद के ढाँचे की बुनियादी खराबी है तुम्‍हारी मेज चाँदी की तुम्‍हारे ज़ाम सोने के यहाँ जुम्‍मन के घर में आज भी फूटी रक़ाबी है घर में ठंडे चूल्हे पर अगर खाली पतीली है घर में ठंडे चूल्हे पर अगर खाली पतीली है बताओ कैसे लिख दूँ धूप फागुन की नशीली है भटकती है हमारे गाँव में गूँगी भिखारन-सी सुबह से फरवरी बीमार पत्नी से भी पीली है ...

धुप्प दा टोटा(धूप का टुकड़ा)- अमृता प्रीतम

अभी कुछ दिनों पहले ही पंजाबी की प्रसिद्ध कवियित्री अमृता प्रीतम की कुछ  कविताएँ  पढने को मिली। उनकी एक कविता पंजाबी और उसके हिंदी अनुवाद के साथ...  धुप्प दा टोटा मैनू उह वेला याद ए— जद इक टोटा धुप्प सूरज दी उँगली फड़. के न्हेरे दा मेला वैखदां भीड़ां दे विच्च गुआचिया। सोचदी हाँ — सहिम दा ते सुंज दा वी साक हुंदा ए मैं जु इस दी कुछ नहीं लगदी पर इस गुआचे बाल ने इक हत्थ मेरा फड़ लिआ तू किते लभदा नहीं— हत्त्थ नू छोंहदा पिआ निक्का ते तत्ता इक साह ना हत्त्थ दे नाल परचदा ना हत्त्थ दा खांदा वसाह न्हेरा किते मुकदा नहीं मेले दे रौले विच्च वी है इक आलम चुप्प दा ते याद तेरी इस तरहाँ जिओं इक टोटा धुप्प दा. और अब  इस कविता का  हिंदी अनुवाद धूप का टुकड़ा मुझे वह समय याद है— जब धूप का एक टुकड़ा सूरज की उंगली थाम कर अंधेरे का मेला देखता उस भीड़ में खो गया। सोचती हूँ : सहम का और सूनेपन का एक नाता है मैं इसकी कुछ नहीं लगती पर इस खोए बच्चे ने मेरा हाथ थाम लिया तुम कहीं नहीं मिलते हाथ को छू रहा है एक नन्हा सा गर्म श्वास न  न  हाथ से बहलता है न हाथ...

काश! कि मैं, तुम और तुम, मैं बन सकते

काश! काश! कि मैं, तुम और तुम, मैं बन सकते  तभी तुम्हें मालूम हो सकता मेरे दिल का हाल तुम मेरे दिल में देखते  मैं तुम्हारे दिल में झांक लेता  तुम्हारे लिए मेरे दिल में  प्यार का कितना बड़ा  समंदर मेरे अनकही बातों को तुम समझ लेते  अब तुम्हारी  चुप्पी को मैं जान लेता  तुम्हारी यादों को कैसे मैंने संजोया है उन पलों का किस्सा भी इसमें  जब ये फूट फूट रोया है  उस वक़्त का हिस्सा भी ज़रूर होगा तुम्हारे दिल में  जब मैंने तुम्हारा दिल दुखाया है काश! काश! कि मैं, तुम और तुम, मैं बन सकते  तभी तुम्हें मालूम हो सकता मेरे दिल का हाल  तुम मेरे दिल में देखते  मैं तुम्हारे दिल में झांक लेता तुम भी साँझ लेती  कि थे वो मेरे ऐसे ही हालात जिन्हें तुम बहाने समझती थी तब होता इल्म तुम्हें जिन्हें तुम राज़ समझती थी  कुछ ग़लतफ़हमियाँ मेरी भी दूर होती  काश! काश! कि मैं, तुम और तुम, मैं बन सकते  तभी तुम्हें मालूम हो स...

तलाश...

हर किसी को अपने हिस्से के आसमान की  है   तलाश  उस आसमान को छूने की हर मन में दबी   है   एक आस  मंज़िल बहुत दूर नहीं ,   यहीं-कहीं  है   आस-पास  हर किसी को अपने हिस्से के आसमान की   है   तलाश  उस आसमान को छूने की हर मन में दबी  है   एक आस चलते-चलते ,   उड़ते-उड़ते कहीं कम न हो प्यास मन में अगर हौसला है तो फिर क्या बात उस ऊंचाई को पाने की ललक सपनों   में हो   उस आस का   एक   छोर इस   उम्मीद से बंधा हो   कि कभी तो अपने हिस्से को छू   लेंगे हम   बदलेगा कभी तो अपनी क़िस्मत का रंग इन्द्रधनुष के सभी रंग उस पल होंगे अपने   संग सूरज की तरह आसमान में चमकने की है   चाह लेकिन   मालूम है बहुत कठिन है ये राह   इन राहों में भी  कहीं  तो  होंगे  कुछ पलाश   हर किसी को अपने हिस्से के आसमान की  है   तलाश  उस आसमान को छूने की हर मन में दबी   है   एक आस  मंज़िल बहुत दूर नहीं ,...

फलक (फेसबुक लघु कथाएं)

सबसे  पहले  फलक (फेसबुक लघु कथाएं) का धन्यवाद, जिसने इन कहानियों  को  आकार  देने में बहुत  सहायता की.  पिछले कुछ समय से फ़लक (फेसबुक लघु कथाएँ) के मंच पर कहानियां लिख रहा हूँ. आज उन सभी कहानियों  को  साझा कर रहा हूँ.  इन कहानियों का तानाबाना हमारी ज़िन्दगी के चारों ओर ही बुना गया है. एक कोशिश है अपने आस-पास के माहौल के भीतर झाँकने की. .. 1 .  July 3 at 6:07pm        रेड लाइट पर काले रंग क़ी लम्बी-सी कार आकर रुकी. कार क़ी पीछे क़ी सीट पर बैठा एक बच्चा आइसक्रीम खा रहा था. सड़क किनारे फुटपाथ से के एक बच्चा उतरा और कार क़ी खिड़की के पास खड़े हो उस बच्चे को देखने लगा. आइसक्रीम थोड़ी-सी ही बची थी. मम्मी कार का शीशा बंद करने लगी. तभी न जाने उस बच्चे के मन में क्या आया? बच्चे ने मम्मी का हाथ रोका और आइसक्रीम कार क़ी खिड़की से बाहर फेंक दी. वो बच्चा सड़क से आइसक्रीम उठा कर खाने लगा. बच्चे ने बच्चे के मन को समझ लिया लेकिन एक मां बच्चे का मन न समझ सकी... 2.   J uly 16 at 11:17pm     अभी दो...

जा रहे हो तुम मेरे शहर...

जा रहे हो तुम मेरे शहर ज़रा तुम मुझसे मिल कर जाना कुछ बाते कहनी है तुम से ज़रा दो घड़ी का समय मुझे देते जाना कुछ सामान नहीं देना है तुम को  बस एक छोटा-सा काम है तुमसे  कुछ कहनी है बातें, अपने शहर की तुम से बहुत-सी यादें तो मैं अपने साथ ले आया   लेकिन अभी भी बहुत सी यादें छूट ही गयी हैं  उन्हें ज़रा तुम लेते आना  जा रहे हो तुम मेरे शहर  ज़रा तुम मुझसे मिल कर जाना कुछ बाते कहनी है तुम से ज़रा दो घड़ी का समय मुझे देते जाना कहना मेरे शहर से तुम  कि उसे याद करके मैं अभी भी रोता  हूं बंद कमरे में उसकी यादों को संजोता हूं  अपने शहर वो गलियां याद आती हैं जहाँ गुज़ारी शामें, अपनी जिंदगी की मैंने हंसी जिन्हें सोच आ जाती है, आँखों में अब भी नमी  कोई कमी नहीं इस नए शहर में  लेकिन अपना शहर तो अपना ही होता है  तभी तो उसे याद कर, हर एक अकेले में रोता है  इस नए शहर में दिल लगाने की जितनी भी कोशिश करता हूं  जाने क्यों, उतना अपने ही से लड़ता हू...

एक सफ़र मेट्रो में...

जब भी सफ़र करता हूँ मेट्रो में  कुछ अजीब सा महसूस होता है  कुछ ऐसी ख़ामोशी, कुछ ऐसी चुप्पी  शायद आपको भी चुभती होगी  लगता है  ऐसे,  जैसे  हज़ारों की भीड़ में अकेले हैं   कुछ चेहरे पुराने और कुछ नए होते हैं  लेकिन सभी चेहरों पर एक ही भाव होते हैं  होंठों पर चुप्पी, जैसी कोई सजा हो मिली  इंसान है या पत्थर की मूरत क्यों बनी ऐसी ये सूरत  ये कैसा आवरण सभी ने लपेटा है? एक अजीब सा सन्नाटा छाया है जिसमे सिर्फ मेट्रो का शोर है   अरे! ऐसे चुप क्यों बैठे हो किसकी गिरी सरकार है  किसके जीवन में चिंताएं नहीं हज़ार है  जिसने   पहली  बार किया सफ़र, उसके लिए तो ये सफ़र यादगार है     लेकिन जो रोज़ करतें है सफ़र, उन्हें अपने साथियों के चंद शब्दों का इंतज़ार है  सुना था ट्रेन के सफ़र में रिश्ते-नाते जुड़ जाते थे लेकिन इस सफ़र में साथ मिल कर भी, कुछ बोल नहीं  पातें हैं  संग अपने ख़ामोशी  लाते हैं और ख़ामोशी ले जाते हैं  चुप रहते हैं और चु...

आख़िर कब तक

आख़िर कब तक मैं यहां-वहां की बातें करूं कुछ कहना चाहता हूँ पर कैसे कहूं जो दिल में है उसे कब तक समेटे रहूं वो कुछ ख़ास लफ्ज़, जो होंठों तक आतें हैं न जाने क्यों, फिर वापस लौट जातें हैं डरता हूँ कि कहीं तुम्हें खो न दूं अपने को कहीं दर्द और तनहाइयों में न डुबो दूं शिक़ायत है अपने आप से कि अभी तक  तुमसे, वो बात कह नहीं पाया हर बार अपने को, जहां था वहीं पाया  हिचक है मन में अभी जो न थी पहले कभी कब तक मैं यूँ ही आहें भरूं  आख़िर कब तक मैं यहां-वहां की बातें करूं तुम्हारे दिल में क्या है, जानना चाहता हूँ तुम से वो बात करना चाहता हूँ जो कहने को सोचा है उसे तुम्हे कितना बता पाऊंगा यही सोच कर उलझन में हूँ अब तुम ही बता दो कैसे वो बात तुमसे ही कहूं आख़िर कब तक मैं यहां-वहां की बातें करूं कुछ कहना चाहता हूँ पर कैसे कहूं

सपनो की मंज़िल

तुम आज जहाँ पर हो ये कभी तुम्हारा सपना था  तुम आज जहाँ पर हो ये आज भी, किसी और का सपना है इस सपने को सच करने को तुम्हे रात-रात भर जगना था सोच तुम्हारी उस वक़्त कि अब हर हाल में कुछ करना है कितनी कोशिशें नाकाम हुईं तब जाकर ये मंज़िल अपने नाम हुई अरसा हुआ उन यादों को  लेकिन आज भी वो ज़हन में ज़िंदा हैं  मालूम नहीं कि कल क्या हो   लेकिन, तुम आज जहाँ पर हो ये कभी तुम्हारा सपना था  तुम आज जहाँ पर हो ये आज भी, किसी और का सपना है याद होगा तुम्हे, कैसे पहुंचे यहाँ तक मीलों दूर का सफ़र किया यहाँ तक खट्टे-मीठे कुछ दौर आएं होंगे कुछ चुभते होंगे, कुछ गुदगुदाते होंगे याद होगा तुम्हे कैसे साथी मिले यहाँ तक कुछ छूटे, कुछ साथ रहे और कुछ नए बने यहाँ तक  लाज़मी हैं कि आगे और आगे अभी जाना होगा देखें होंगे और भी सपने तुमने अनजानी राहों पर चलना होगा शायद उनकी मंज़िल अभी दूर कहीं है ज़िंदगी का सफ़र बस यूँ चलता रहेगा सपनो का टूटना और बुनना चलता रहेगा  अपने यादों को यूँ ही दिल में संजो कर रखना फिर किस...

इजाज़त

खिलखिला कर हँसना तो चाहता हूं, लेकिन मेरे हालात मुझे इजाज़त नहीं देते. रोना भी तो चाहता हूं, लेकिन मेरे आंसू मुझे इजाज़त नहीं देते. आसमान में ऊंची उड़ान तो भरना चाहता हूं, लेकिन टूटे पंख इजाज़त नहीं देते. ज़मीं पर भी तेज़ चलना चाहता हूं, लेकिन रास्तों के अनजाने मोड़ मुझे इजाज़त नहीं देते. अपने पर भरोसा तो बहुत है, लेकिन मंजिल की दूरी इजाज़त नहीं देती. सपने तो देखना चाहता हूं, लेकिन मेरी सूनी आँखे मुझे इजाज़त नहीं देती. जिंदगी के सवालों से उलझना तो चाहता हूं, लेकिन कशमकश मुझे इजाज़त नहीं देती. हवा का रुख़ मोड़ना तो चाहता हूं, लेकिन मुझे ये तूफ़ान इजाज़त नहीं देता.  कोशिश तो करना चाहता हूं, लेकिन नाकामयाबी  का डर इजाज़त नहीं देता.  अपने अन्दर बदलाव तो लाना चाहता हूं, लेकिन अंतर्मन इजाज़त नहीं देता. लक्ष्य को साधना तो चाहता हूं, लेकिन भटकता मन इसकी इजाज़त नहीं देता.    आने वाले कल को देखना तो चाहता हूं, लेकिन मेरा आज इसकी इजाज़त न...

मेरी-तुम्हारी चुप...

मैं भी हूँ चुप और तुम भी हो चुप क्यों इतनी ख़ामोशी है गहरायी फिर क्यूँ मैं तुम से और तुम मुझ से मिलने  इतनी दूर तक चली आयीं  दोनों के संग होते हुए, अभी भी है तन्हाई  या पिछली मुलाक़ात की अभी दूर नहीं हुई रुसवाई क्या इस सोच में हो चुप कि पहले वो बोले फिर मैं बोलूं  क्या इस ख़ामोशी में अब हमारी सांसें ही बातें करेंगी  कुछ अपने दिल का हाल बयाँ करेंगी  और कुछ मेरे दिल का सुना करेंगी दिलों की धड़कने आपस में टकराती हैं लहरों की तरह शोर मचाती हैं क्या उसने सुना इनकी आहट को  क्या उनके दिल में चल रही है कुछ हलचल कुछ मेरे दिल में भी है उथल-पुथल क्यों लफ़्ज़ों का कारवां अब थम सा गया है  क्या हुआ ये और क्यों हुआ ये  सवाल अब हम दोनों अपने से ही करते हैं बीच-बीच में चोर निगाहों से इक-दूजे को देखा करतें हैं आख़िर कब तक सांसें-सांसों से बातें करेंगी कब तक धड़कने शोर करेंगी और कब, लफ्ज़ होंठो का साथ छोड़ेंगे चलो अब हम अपनी ख़ामोशी तोड़े इस चुप्पी को अब पीछे छोड़े चलो अब पिछली बातों को छ...

अपने-अपने हिमालय बनाएं...

चलो, आज हम अपने-अपने हिमालय बनाएं उसके शिखर को छूकर एक नया इतिहास बनाएं हम सभी ने सोचे है अपने जीवन के हिमालय आज उसी सोच को धरा पर उतार लाएँ  चलो, आज हम अपने-अपने हिमालय बनाएं उसके शिखर को छूकर एक नया इतिहास बनाएं क्या हो हमारे हिमालय की ऊंचाई  क्या हो उस तक पहुँचने का रास्ता  ये सभी कुछ तो हमे ही निश्चित करना है मालूम है हमें ये सफ़र आसां न होगा  रास्ते की मुश्क़िलों से दो-चार होना होगा अपने हौसलों का इम्तेहान हमे देना होगा अपने सब्र को अभी बेसब्र बनने से रोकना होगा लेकिन अब सोचें नहीं, अपने क़दम तो बढ़ाएं  चलो, आज हम अपने-अपने हिमालय बनाएं उसके शिखर को छूकर, एक नया इतिहास बनाएं कुछ असम्भव को संभव करके दिखाएं चलो, आज तूफ़ान में कुछ दिए जलाएं  समय की रेत पर अपने कुछ निशां बनाएं इस कठिन डगर पर आने वालों को नई दिशा दिखाएं चलो, आज हम अपने-अपने हिमालय बनाएं उसके शिखर को छूकर एक नया इतिहास बनाएं...

हमारे रिश्ते...

हमारे रिश्ते भी क्या ऐसे बने कि वो कागज़ी हो गए सिर्फ नाम के रिश्ते अपनी ज़िंदगी में रह गए वक़्त की परत में ऐसे दबे कि सब धुंधले हो गए अनजानों को क्या कहे जब अपने ही अजनबी हो गए  अपना कह कर, जिनके संग चले थे हम  रास्तो के मोड़ पर, हमको अकेला छोड़ कर  किनारे से ही, वो हम से कट लिए   हमारे रिश्ते भी क्या ऐसे बने कि वो कागज़ी हो गए सिर्फ नाम के रिश्ते अपनी ज़िंदगी में रह गए  क्या कहेंगे दुनिया से कि वो हमारे क्या थे  ये सोच कर परेशान हूँ कि वो अब हमारे क्या हैं आवाज़ को क्या, हम तो उनकी यादों को भी तरसे न जाने क्यों, आज बहुत दिनों के बाद ये नैना भी बरसे   रिश्ते भी ऐसे बने कि उनमे अहसासों  की दस्तक हो लम्हों का मिलना और फिर सदियों का बिछुड़ना न हो उनमे वो पहले वाली बातें हो कम ही सही, लेकिन मुलाक़ातें तो हों आख़िर रिश्ते की बड़ी है नाज़ुक डोर दोनों तरफ से बंधा हो इसका छोर लेकिन फिर सोचता हूँ कि सिर्फ मेरे चाहने से होगा क्या कुछ उनकी तरफ से...