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काश! कि मैं, तुम और तुम, मैं बन सकते

काश! काश! कि मैं, तुम और तुम, मैं बन सकते  तभी तुम्हें मालूम हो सकता मेरे दिल का हाल तुम मेरे दिल में देखते  मैं तुम्हारे दिल में झांक लेता  तुम्हारे लिए मेरे दिल में  प्यार का कितना बड़ा  समंदर मेरे अनकही बातों को तुम समझ लेते  अब तुम्हारी  चुप्पी को मैं जान लेता  तुम्हारी यादों को कैसे मैंने संजोया है उन पलों का किस्सा भी इसमें  जब ये फूट फूट रोया है  उस वक़्त का हिस्सा भी ज़रूर होगा तुम्हारे दिल में  जब मैंने तुम्हारा दिल दुखाया है काश! काश! कि मैं, तुम और तुम, मैं बन सकते  तभी तुम्हें मालूम हो सकता मेरे दिल का हाल  तुम मेरे दिल में देखते  मैं तुम्हारे दिल में झांक लेता तुम भी साँझ लेती  कि थे वो मेरे ऐसे ही हालात जिन्हें तुम बहाने समझती थी तब होता इल्म तुम्हें जिन्हें तुम राज़ समझती थी  कुछ ग़लतफ़हमियाँ मेरी भी दूर होती  काश! काश! कि मैं, तुम और तुम, मैं बन सकते  तभी तुम्हें मालूम हो स...

तलाश...

हर किसी को अपने हिस्से के आसमान की  है   तलाश  उस आसमान को छूने की हर मन में दबी   है   एक आस  मंज़िल बहुत दूर नहीं ,   यहीं-कहीं  है   आस-पास  हर किसी को अपने हिस्से के आसमान की   है   तलाश  उस आसमान को छूने की हर मन में दबी  है   एक आस चलते-चलते ,   उड़ते-उड़ते कहीं कम न हो प्यास मन में अगर हौसला है तो फिर क्या बात उस ऊंचाई को पाने की ललक सपनों   में हो   उस आस का   एक   छोर इस   उम्मीद से बंधा हो   कि कभी तो अपने हिस्से को छू   लेंगे हम   बदलेगा कभी तो अपनी क़िस्मत का रंग इन्द्रधनुष के सभी रंग उस पल होंगे अपने   संग सूरज की तरह आसमान में चमकने की है   चाह लेकिन   मालूम है बहुत कठिन है ये राह   इन राहों में भी  कहीं  तो  होंगे  कुछ पलाश   हर किसी को अपने हिस्से के आसमान की  है   तलाश  उस आसमान को छूने की हर मन में दबी   है   एक आस  मंज़िल बहुत दूर नहीं ,...

फलक (फेसबुक लघु कथाएं)

सबसे  पहले  फलक (फेसबुक लघु कथाएं) का धन्यवाद, जिसने इन कहानियों  को  आकार  देने में बहुत  सहायता की.  पिछले कुछ समय से फ़लक (फेसबुक लघु कथाएँ) के मंच पर कहानियां लिख रहा हूँ. आज उन सभी कहानियों  को  साझा कर रहा हूँ.  इन कहानियों का तानाबाना हमारी ज़िन्दगी के चारों ओर ही बुना गया है. एक कोशिश है अपने आस-पास के माहौल के भीतर झाँकने की. .. 1 .  July 3 at 6:07pm        रेड लाइट पर काले रंग क़ी लम्बी-सी कार आकर रुकी. कार क़ी पीछे क़ी सीट पर बैठा एक बच्चा आइसक्रीम खा रहा था. सड़क किनारे फुटपाथ से के एक बच्चा उतरा और कार क़ी खिड़की के पास खड़े हो उस बच्चे को देखने लगा. आइसक्रीम थोड़ी-सी ही बची थी. मम्मी कार का शीशा बंद करने लगी. तभी न जाने उस बच्चे के मन में क्या आया? बच्चे ने मम्मी का हाथ रोका और आइसक्रीम कार क़ी खिड़की से बाहर फेंक दी. वो बच्चा सड़क से आइसक्रीम उठा कर खाने लगा. बच्चे ने बच्चे के मन को समझ लिया लेकिन एक मां बच्चे का मन न समझ सकी... 2.   J uly 16 at 11:17pm     अभी दो...

जा रहे हो तुम मेरे शहर...

जा रहे हो तुम मेरे शहर ज़रा तुम मुझसे मिल कर जाना कुछ बाते कहनी है तुम से ज़रा दो घड़ी का समय मुझे देते जाना कुछ सामान नहीं देना है तुम को  बस एक छोटा-सा काम है तुमसे  कुछ कहनी है बातें, अपने शहर की तुम से बहुत-सी यादें तो मैं अपने साथ ले आया   लेकिन अभी भी बहुत सी यादें छूट ही गयी हैं  उन्हें ज़रा तुम लेते आना  जा रहे हो तुम मेरे शहर  ज़रा तुम मुझसे मिल कर जाना कुछ बाते कहनी है तुम से ज़रा दो घड़ी का समय मुझे देते जाना कहना मेरे शहर से तुम  कि उसे याद करके मैं अभी भी रोता  हूं बंद कमरे में उसकी यादों को संजोता हूं  अपने शहर वो गलियां याद आती हैं जहाँ गुज़ारी शामें, अपनी जिंदगी की मैंने हंसी जिन्हें सोच आ जाती है, आँखों में अब भी नमी  कोई कमी नहीं इस नए शहर में  लेकिन अपना शहर तो अपना ही होता है  तभी तो उसे याद कर, हर एक अकेले में रोता है  इस नए शहर में दिल लगाने की जितनी भी कोशिश करता हूं  जाने क्यों, उतना अपने ही से लड़ता हू...

एक सफ़र मेट्रो में...

जब भी सफ़र करता हूँ मेट्रो में  कुछ अजीब सा महसूस होता है  कुछ ऐसी ख़ामोशी, कुछ ऐसी चुप्पी  शायद आपको भी चुभती होगी  लगता है  ऐसे,  जैसे  हज़ारों की भीड़ में अकेले हैं   कुछ चेहरे पुराने और कुछ नए होते हैं  लेकिन सभी चेहरों पर एक ही भाव होते हैं  होंठों पर चुप्पी, जैसी कोई सजा हो मिली  इंसान है या पत्थर की मूरत क्यों बनी ऐसी ये सूरत  ये कैसा आवरण सभी ने लपेटा है? एक अजीब सा सन्नाटा छाया है जिसमे सिर्फ मेट्रो का शोर है   अरे! ऐसे चुप क्यों बैठे हो किसकी गिरी सरकार है  किसके जीवन में चिंताएं नहीं हज़ार है  जिसने   पहली  बार किया सफ़र, उसके लिए तो ये सफ़र यादगार है     लेकिन जो रोज़ करतें है सफ़र, उन्हें अपने साथियों के चंद शब्दों का इंतज़ार है  सुना था ट्रेन के सफ़र में रिश्ते-नाते जुड़ जाते थे लेकिन इस सफ़र में साथ मिल कर भी, कुछ बोल नहीं  पातें हैं  संग अपने ख़ामोशी  लाते हैं और ख़ामोशी ले जाते हैं  चुप रहते हैं और चु...

आख़िर कब तक

आख़िर कब तक मैं यहां-वहां की बातें करूं कुछ कहना चाहता हूँ पर कैसे कहूं जो दिल में है उसे कब तक समेटे रहूं वो कुछ ख़ास लफ्ज़, जो होंठों तक आतें हैं न जाने क्यों, फिर वापस लौट जातें हैं डरता हूँ कि कहीं तुम्हें खो न दूं अपने को कहीं दर्द और तनहाइयों में न डुबो दूं शिक़ायत है अपने आप से कि अभी तक  तुमसे, वो बात कह नहीं पाया हर बार अपने को, जहां था वहीं पाया  हिचक है मन में अभी जो न थी पहले कभी कब तक मैं यूँ ही आहें भरूं  आख़िर कब तक मैं यहां-वहां की बातें करूं तुम्हारे दिल में क्या है, जानना चाहता हूँ तुम से वो बात करना चाहता हूँ जो कहने को सोचा है उसे तुम्हे कितना बता पाऊंगा यही सोच कर उलझन में हूँ अब तुम ही बता दो कैसे वो बात तुमसे ही कहूं आख़िर कब तक मैं यहां-वहां की बातें करूं कुछ कहना चाहता हूँ पर कैसे कहूं

सपनो की मंज़िल

तुम आज जहाँ पर हो ये कभी तुम्हारा सपना था  तुम आज जहाँ पर हो ये आज भी, किसी और का सपना है इस सपने को सच करने को तुम्हे रात-रात भर जगना था सोच तुम्हारी उस वक़्त कि अब हर हाल में कुछ करना है कितनी कोशिशें नाकाम हुईं तब जाकर ये मंज़िल अपने नाम हुई अरसा हुआ उन यादों को  लेकिन आज भी वो ज़हन में ज़िंदा हैं  मालूम नहीं कि कल क्या हो   लेकिन, तुम आज जहाँ पर हो ये कभी तुम्हारा सपना था  तुम आज जहाँ पर हो ये आज भी, किसी और का सपना है याद होगा तुम्हे, कैसे पहुंचे यहाँ तक मीलों दूर का सफ़र किया यहाँ तक खट्टे-मीठे कुछ दौर आएं होंगे कुछ चुभते होंगे, कुछ गुदगुदाते होंगे याद होगा तुम्हे कैसे साथी मिले यहाँ तक कुछ छूटे, कुछ साथ रहे और कुछ नए बने यहाँ तक  लाज़मी हैं कि आगे और आगे अभी जाना होगा देखें होंगे और भी सपने तुमने अनजानी राहों पर चलना होगा शायद उनकी मंज़िल अभी दूर कहीं है ज़िंदगी का सफ़र बस यूँ चलता रहेगा सपनो का टूटना और बुनना चलता रहेगा  अपने यादों को यूँ ही दिल में संजो कर रखना फिर किस...